मनुष्य न तो केवल बुद्धि है, न केवल पशु सम शरीर मात्र है, और न अकेला हृदय या आत्मा है | इन तीनों का उचित और संतुलित सम्मिश्रण पूरे मानव के निर्माण के लिये आवश्यक है और उसी में शिक्षा का सच्चा अर्थशास्त्र है । राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी का शिक्षा सम्बधी यह विचार सर्वकालिक और सदा प्रासंगिक है । किसी भी समाज या राष्ट्र की पहचान एवं प्रगति उसके नागरिकों से ही होती है और नागरिक का निर्माण शिक्षा के माध्यम से ही सम्भव है । राष्ट्र का भविष्य शिक्षा पर आधृत है, इसीलिए आवश्यक है कि उस बुनियाद अर्थात शिक्षाको मजबूत करें जो देश का भविष्य बनाता एवं संवारता है । शिक्षा यद्यपि जीविका निर्वाह की दृष्टि से ग्रहण करना आवश्यक है किन्तु मात्र जीविका प्राप्ति जिसका लक्ष्य होना पर्याप्त नहीं है शिक्षा तो जीवन जीने की कला का नाम है तो जीवन की उपलब्धियां भी जीवन को संतोष या आनंद की तृप्ति नहीं दे पायेगी । शिक्षा यदि प्रभावित करने का सामर्थ्य देती है तो शिक्षा से प्रभावित करने का धर्म भी सीखना आवश्यक है । आज मानव और समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है " तमसो मा ज्योतिर्गमय " हम अंधकार से प्रकाश की ओर - गमन करें । हम अज्ञान से ज्ञान की ओर चले । यह ज्ञान का मार्ग ही मानवता का पथ प्रशस्त करेगा । मानवता के आश्रय में ही मानव, समाज, राष्ट्र या विश्व संरक्षित एवं सुखी हो सकता है, किन्तु मात्र नहीं है । शिक्षा तो जीवन उपलब्धियों भी जीवन को संरक्षित एवं सुखी हो सकता है । हमारा दायित्व , हमारा आहवान करता है कि हम सम्पूर्ण निळा एवं लगन भरी परिभ्रमशीलता के साथ अपनी - अपनी भूमिकाओं में रचनात्मक एवं सार्थक हो उठे । मेरा विश्वास है कि विद्यालय परिवार के सदस्य दायित्व निर्वाह में कीर्ति अर्जित कर अपने दायित्वों के साथ - न्याय करते हुआ संतोष की अनुभूति प्राप्त करेंगे । विद्यार्थियों में चिंतन और अभि व्यक्ति की क्षमता के पोषण, प्रोत्साहन एवं संवर्द्धन के लिये विद्यालय के सदस्यो का एक सशक्त माध्यम है । हमारी नई पीढ़ी जीवन यात्रा में विचारों की नई शक्ति पूर्ण उत्साह और मानवीय संस्कारी से सम्पन्न होकर आंग बढ़े तथा राष्ट्र के नव निर्माण में सार्थक योगदान दें , यही मेरी हार्दिक अभिलाष एवं अपेक्षा है । विद्यालय की गौरव वृद्धि में इनका योगदान हमारा आत्म सन्तोष एवं सौभाग्य होगा ।